
- Brand: Pravasi Prem Publishing India
- Language: HIndi
- Weight: 300.00g
- Dimensions: 22.00cm x 14.00cm x 2.00cm
- ISBN: 9788168988224
1947 का बंटवारा सिर्फ नक्शे पर खींची गई एक बेदर्द लकीर नहीं था, यह करोड़ों दिलों, साझी तहज़ीब और सदियों पुरानी यादों का निर्मम क़त्ल था। क्या अगर भगत सिंह जीवित होते, तो मुल्क के दो टुकड़े होने देते? अगर नेताजी सुभाष चंद्र बोस होते, तो क्या वे इसके खिलाफ सड़कों पर नहीं उतरते? और जो लोग जिन्ना के एक इशारे पर अपना हँसता-खेलता घर छोड़ आए, वे आज पाकिस्तान में 'मुहाजिर' बनकर क्यों भटक रहे हैं? वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ल की यह किताब इतिहास के उन्हीं अनसुलझे और असहज करने वाले सवालों की परतें उघाड़ती है। रावलपिंडी की गलियों से उजड़कर दिल्ली जंक्शन पर उतरे शरणार्थियों की सिसकियों से लेकर, थोआ खालसा की औरतों की खामोश चीखों तक; कोटला में नूरजहाँ के आशिक से लेकर बटर चिकन के ईजाद होने की दास्तान तक—यह किताब बंटवारे की केवल त्रासदी ही नहीं बयान करती, बल्कि राख के ढेर से उठकर नए भारत का निर्माण करने वाले उद्यमी शरणार्थियों के ज़ज्बे को भी सलाम करती है। यह दस्तावेज़ किसी राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं, बल्कि छोटी-छोटी मानवीय घटनाओं, भूली-बिसरी यादों और उन चुभते सवालों का आईना है, जो आज भी हर संवेदनशील भारतीय और पाकिस्तानी के ज़हन में गूँजते हैं—"आखिर हम क्यों बिछुड़े?" विवेक शुक्ला बीते करीब चार दशकों से हिन्दी-अंग्रेजी में लिख-पढ़ रहे हैं। कई मीडिया संस्थानों में अहम ओहदों पर रहे हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में दक्षिण एशिया, भारतवंशी, पाकिस्तान, बिजनेस और दिल्ली खास रहे हैं। गांधी जी के दिल्ली से संबंधों पर इनकी किताब ‘Gandhi’s Delhi: April 12, 1915 – January 30, 1948 and Beyond’ 2019 में और ‘दिल्ली का पहला प्यार – कनॉट प्लेस’ 2023 में लिखी गई। उन्होंने ‘तालीम की रोशनी फैलाते हुए मकसूद अहमद’ शीर्षक से भी एक किताब लिखी। उन्होंने विट्ठलभाई पटेल पर दिल्ली विधानसभा की तरफ से प्रकाशित किताब का संयुक्त रूप से संपादन किया है। करीब एक दर्जन देशों की यात्रा कर चुके विवेक शुक्ला नवभारत टाइम्स, बीबीसी, टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, द पैट्रियट, हिन्दुस्तान आदि के लिए लगातार लिखते हैं।
